लेखक – Suresh Kumar
📚 स्कूल का वो बंद कमरा
एक दृश्य – यादों की आँखों से
बरसात की बूंदों के निशान अब भी पुराने सीमेंट पर जमे हुए थे।
स्कूल का वह कमरा, जिसके बाहर “साइंस लेब” लिखा था, आज पूरी तरह बंद था।
लोहे का जंग लगा दरवाज़ा, जैसे किसी रहस्य को अपने अंदर छिपाए बैठा हो।
बरामदे में बच्चे बैठे थे — कतारबद्ध, चुपचाप, दबे-दबे से।
किसी ने अपनी हथेली से मुँह ढक रखा था, कोई अपनी उँगलियों से पत्थर कुरेद रहा था ज़मीन में।
साँसों की आवाज़ भी धीमी हो चुकी थी — डर अब बच्चों की आँखों में उतर चुका था।
किसी ने फुसफुसाकर कहा – "यही वो कमरा है, जहां वो कंकाल टंगे हैं..."
दूसरे ने आँखें चौड़ी करते हुए जोड़ा – "वो भूत भी यहीं आता है..."
कभी-कभी हवा चलती, तो दरवाज़े की छोटी-सी खिड़की खट से हिलती।
बच्चे चौंककर उधर देखने लगते – दिल जैसे गले में अटक जाता।
सन्नाटा ऐसा कि अगर कोई पत्ता भी गिर जाए, तो ऐसा लगे जैसे किसी ने ज़ोर से चीख मारी हो।
और उस कमरे का दरवाज़ा…
वो तो जैसे सांस ले रहा हो — अंदर कुछ है... पर क्या?
सिर झुकाए मास्टर जी धीरे से बोले, "चुपचाप बैठो… अंदर मत झांकना…"
और बच्चों की निगाहें फिर से ज़मीन पर गड़ गईं।
कुछ बातें होती हैं जिन्हें हम बचपन में कभी मानना नहीं चाहते, लेकिन जब वो हमारे साथ घटती हैं, तो सच बन जाती हैं। ऐसी ही एक घटना मेरे साथ भी हुई — डरावनी, अजीब, और आज तक मेरे ज़ेहन में गूंजती है।
मैं उस वक़्त आठवीं कक्षा में पढ़ता था, नैबे के स्कूल में। हमारे हेड मास्टर का नाम था नायब सिंह, लेकिन हम सब उन्हें नैबा कहते थे। एक दिन स्कूल में अचानक मधुमक्खियों का हमला हो गया। कमरे क्या, बरामदे तक भर गए। जलाने की कोशिशें हुईं, भगाने की कोशिशें हुईं, लेकिन मधुमक्खियाँ टस से मस नहीं हुईं।
बचाव में सब बच्चों को पास के सरकारी स्कूल ले जाया गया। वहां उस दिन छुट्टी थी, इसलिए हम सब वहीं जाकर एक बरामदे में बैठ गए — ठीक साइंस लैब के सामने। उस कमरे में कंकाल टंगे थे – प्लास्टिक के, ये हमें तब नहीं पता था। हमारे लिए वो भूत थे।
उसी दिन मुझे बुखार हो गया। घर आया तो तेज़ बुखार के साथ बेसुध हो गया। जब आँख खुली तो माँ ने पूछा – "तू बिहारी में क्या बोल रहा था बेटा?"
मैं चौंक गया – मैंने क्या बोला?
माँ ने कहा – "तू बुखार में बार-बार कह रहा था – 'हम बिटवा को ले जायेगा… हम बिटवा को ले जायेगा'"
सुनकर रूह कांप उठी।
तब गांव में बातें फैल गईं — कि उस स्कूल में एक बिहारी भईया की आत्मा रहती है, जिसकी कभी वहां मौत हो गई थी। मैं पहले इन बातों को झूठ मानता था, लेकिन उस दिन... जब बुखार में मैं खुद वो भाषा बोल रहा था, तो डर हकीकत बन गया।
तख्त पर लेटे हुए मुझे ऐसा लगा जैसे नीचे कोई सांप रेंग रहा हो, जैसे झोले में से कुछ निकल रहा हो, जैसे कोई मेरी पीठ में चुंटी काट रहा हो। मैंने माँ से कहा – "माँ, शायद मेरे अंदर वही भईया घुस गया था!"
धीरे-धीरे बुखार ठीक हुआ, दवाई ली, तो शरीर तो ठीक हो गया, पर मन में जो डर बैठा, वो कई दिनों तक साथ रहा।
आज जब मैं उन बातों को सोचता हूँ, तो हँसी भी आती है और एक सवाल भी –
क्या वो सच था?
या सिर्फ बचपन की कल्पना, जो हमारे डर से मिलकर हकीकत बन गई?

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